Posts

Showing posts from November, 2015
इस घर के सूने आँगन में इस घर के सूने आँगन में ,अब मंन कब फिर से बसता है , आहाते के सन्नाटों में , लम्हा -लम्हा ज्यों डसता है | मिट्टी के चिकने हिस्सों को, अपने हाथों से खींचा था , उस प्यारे से दिल के टुकड़े को , मंन के आँसू से सींचा था | बरखा आकर मुस्काती थी , कितने ही सावन झलते थे , मंन के निर्मल उस कोने में , सारे अरमान ना मिलते थे | मंन को अब यही दिलासा है, वो अपना कब, बेगाना था, उस पंछी का अपना न सही, कहने को एक ठिकाना था | गिट्टी के छोटे टुकड़ों से , फिर कई लकीरे खींची थी , अंधड़ से इसे बचाने में , एक बार न आखें मीची थी | अब उस खंडर के टुकड़ो पर, पीपल के सूखे पत्ते है , लगती फिर कई निगाहे हैं , पर हम न उसके हिस्से है | बंजारे थे, बंजारे हैं, अपना कब ठौर-ठिकाना है , इन अपराधों की बस्ती से , मेरा कब याराना है ? बस स्वप्न सदा जीवित रहते, बरखा ऋतु फिर से आएगी , घन मेघ घुमड़ कर बरसेंगे , कितने बसंत मुस्कायेंगे |