प्यारे बचपन फ़िर एक बार | तट पर टकराती लहरों पर, आते जाते इन पहरों पर, बचपन की हंसी हिलोरों पर, मुस्काती हुई कलोललो पर। दादी नानी के किस्सों से , मेरी यादों के हिस्सों से , मन के उन गहन रहस्यों से, उन निश्चलता के रस्तों से , आ जा प्यारे बचपन फिर एक बार चंदा मामा की सपनीली रातों से , तुतलाती हँसती बातों से , चंचल मन की गहराई से , माँ से फिर करी ढिठाई से । | आ जा प्यारे बचपन फिर एक बार नन्हे -नन्हे उन क़दमों पर, हँसते मुस्काते अधरो पर , गीले -गीले उन नयनों पर , भोले -भाले उन सपनो पर | आ जा प्यारे बचपन फिर एक बार
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Showing posts from April, 2015
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मुझको ये तुमसे कहना था, कह ना पाया चुप रहना था | पतझड़ के झड़ते पत्तों को , डाली से फिर कब जुड़ना था । सावन की झड़ती बूंदो को, बादल से फिर कब मिलना था । सागर की उठती लहरों को , तट पर आकर कब रुकना था । जीवन के पथरीले पथ पर , ये हाथ पकड़ कर कब चलना था मुझको ये तुमसे कहना था, कह ना पाया चुप रहना था तेरे बढ़ते इन कदमो को , पीछे मुड़कर कब रुकना था | सूरज की ढलती किरणों को , अम्बर में ही क्यों मिलना था | मुझको ये तुमसे कहना था, कह ना पाया चुप रहना था कल -कल बहते इन झरनो को , नीचे गिरकर कब उठना था | खिलते फूलों की कलियों को , मुरझाकर ही क्यों गिरना था | शायद मेरी ही गलती थी ,निश्छलता का दुःख सहना था | मुझको ये तुमसे कहना था, कह ना पाया चुप रहना था |