मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था |
पतझड़ के झड़ते पत्तों को ,
डाली से फिर कब जुड़ना था ।
सावन की झड़ती बूंदो को,
बादल से फिर कब मिलना था ।
कह ना पाया चुप रहना था |
पतझड़ के झड़ते पत्तों को ,
डाली से फिर कब जुड़ना था ।
सावन की झड़ती बूंदो को,
बादल से फिर कब मिलना था ।
सागर की उठती लहरों को ,
तट पर आकर कब रुकना था ।
जीवन के पथरीले पथ पर ,
ये हाथ पकड़ कर कब चलना था
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था
तेरे बढ़ते इन कदमो को ,
पीछे मुड़कर कब रुकना था |
सूरज की ढलती किरणों को ,
अम्बर में ही क्यों मिलना था |
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था
कल -कल बहते इन झरनो को ,
नीचे गिरकर कब उठना था |
खिलते फूलों की कलियों को ,
मुरझाकर ही क्यों गिरना था |
शायद मेरी ही गलती थी ,निश्छलता का दुःख सहना था |
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था |
तट पर आकर कब रुकना था ।
जीवन के पथरीले पथ पर ,
ये हाथ पकड़ कर कब चलना था
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था
तेरे बढ़ते इन कदमो को ,
पीछे मुड़कर कब रुकना था |
सूरज की ढलती किरणों को ,
अम्बर में ही क्यों मिलना था |
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था
कल -कल बहते इन झरनो को ,
नीचे गिरकर कब उठना था |
खिलते फूलों की कलियों को ,
मुरझाकर ही क्यों गिरना था |
शायद मेरी ही गलती थी ,निश्छलता का दुःख सहना था |
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था |
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