कितने हल्के-हल्के छलके ,
नयनों के कोनो से पलकें,
कोरक स्वपनों सी बिछी हुई,
एकांत धरा की नव झलकें ।

तुम सदा हृदय में निर्विकार,
स्मृति के जैसे छिन्न द्वार,
हे दिशा व्याप्त से मंद पवन,
अरुणोदय विस्तृत नील गगन ।

विधि की रचना है, चल जाये,
आवेग सदा ही बह जाये,
कारण के कारण अलंकार,
तुमसे ही हूँ मैं यूँ साकार ।

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