Posts

Showing posts from 2017
Image
                                                                        मुखौटे  कितने मुखौटे डालकर इंसान चलता शहर में , बेग़ैरती की . इस भीड़ में , बौराई सी एक लहर में | मुखौटे इस कदर हकीक़त को यूँ बदलते रहते है, कि हर लहजे में पानी पर बनी तस्वीर से हिलते रहते है | हर एक मुखौटे की यहाँ अपनी कहानी है , कहीं झूठे दिखावे हैं , कहीं आँखों में पानी है | हर एक चेहरा दूसरे से किस तरह अनजान है , कठपुतलियों के खेल जैसा एक दूसरा इंसान है | यहाँ हर दर्द को दुनिया रंगों में बाँट देती है , कही फिरती "हकीक़त " को कहाँ पहचान देती है| ये काला है,वो भूरा है , वो नीला है, वो पीला है , नहीं देखा किसी ने ये कि दामन आज गीला है |