मुखौटे 



कितने मुखौटे डालकर इंसान चलता शहर में ,
बेग़ैरती की . इस भीड़ में , बौराई सी एक लहर में |
मुखौटे इस कदर हकीक़त को यूँ बदलते रहते है,
कि हर लहजे में पानी पर बनी तस्वीर से हिलते रहते है |

हर एक मुखौटे की यहाँ अपनी कहानी है ,
कहीं झूठे दिखावे हैं , कहीं आँखों में पानी है |
हर एक चेहरा दूसरे से किस तरह अनजान है ,
कठपुतलियों के खेल जैसा एक दूसरा इंसान है |

यहाँ हर दर्द को दुनिया रंगों में बाँट देती है ,
कही फिरती "हकीक़त " को कहाँ पहचान देती है|
ये काला है,वो भूरा है , वो नीला है, वो पीला है ,
नहीं देखा किसी ने ये कि दामन आज गीला है |

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