कितने हल्के-हल्के छलके , नयनों के कोनो से पलकें, कोरक स्वपनों सी बिछी हुई, एकांत धरा की नव झलकें । तुम सदा हृदय में निर्विकार, स्मृति के जैसे छिन्न द्वार, हे दिशा व्याप्त से मंद पवन, अरुणोदय विस्तृत नील गगन । विधि की रचना है, चल जाये, आवेग सदा ही बह जाये, कारण के कारण अलंकार, तुमसे ही हूँ मैं यूँ साकार ।
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जीवन की पंखुड़ियों को खोलकर देखना, उस आभास को जो स्वयं में अतुलनीय है। सामूहिक स्वप्न का ये ईश्वर निमित्त संसार है । विलक्षण, और विलक्षित । एक स्वप्न की तरह हम संसार में आते हैं। बस स्वप्न के बीच से। जिसकी न तो कोई शुरुआत है, और न ही अंत । जैसे स्वप्न की कोई शुरुआत नहीं, न तो इसकी कोई प्रस्तावना और न ही उपसंहार । हर दिन के बाद सोने पर एक नए "संसार" का सृजन और उठने पर उसका विखंडन । प्रतीत होने वाली सब वस्तुएं उतनी ही वास्तविक। कल्पना कीजिये जैसे हम रोने लगते है, सोते-सोते या ह प्रसन्नता से रोम -रोम खिल उठता है। अनुभव वास्तविक प्रतीत होते है, पर वस्तुतः हम जागते हुए भी तो स्वपन ही जीते है। चिरंतन तो वह आत्मा है, मन कल्पनाओं के महल बना देता है और फिर उनमें आप स्वयं ही खो जाते है । यदि मन इतना शक्तिशाली है, तो क्या वो जागते हुए सृजन नही करता होगा? वास्तविक को केवल "आत्मा" है, जो उसका स्वरूप है, बाकी तो सोते-जागते आप कल्पना में जीवित हैं । परंतु वह माया भी सत्य है, हर एक परिकल्पना, हर एक परिपेक्ष्य या नज़रिये । इतनी सुंदर सृष्टि जिसमे रचयिता ही सर्वत्र है। वो क...