इस घर के सूने आँगन में


इस घर के सूने आँगन में ,अब मंन कब फिर से बसता है ,
आहाते के सन्नाटों में , लम्हा -लम्हा ज्यों डसता है |
मिट्टी के चिकने हिस्सों को, अपने हाथों से खींचा था ,
उस प्यारे से दिल के टुकड़े को , मंन के आँसू से सींचा था |
बरखा आकर मुस्काती थी , कितने ही सावन झलते थे ,
मंन के निर्मल उस कोने में , सारे अरमान ना मिलते थे |
मंन को अब यही दिलासा है, वो अपना कब, बेगाना था,
उस पंछी का अपना न सही, कहने को एक ठिकाना था |
गिट्टी के छोटे टुकड़ों से , फिर कई लकीरे खींची थी ,
अंधड़ से इसे बचाने में , एक बार न आखें मीची थी |
अब उस खंडर के टुकड़ो पर, पीपल के सूखे पत्ते है ,
लगती फिर कई निगाहे हैं , पर हम न उसके हिस्से है |
बंजारे थे, बंजारे हैं, अपना कब ठौर-ठिकाना है ,
इन अपराधों की बस्ती से , मेरा कब याराना है ?
बस स्वप्न सदा जीवित रहते, बरखा ऋतु फिर से आएगी ,
घन मेघ घुमड़ कर बरसेंगे , कितने बसंत मुस्कायेंगे |

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